कबीर दास जी का जीवन परिचय

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Kabir Das Ka Jivan Parichay : संत कबीर दास भक्ति काल के महाकवियों में से है जिन्होंने अपने दोहों के माध्यम से अपनी अमिट रचनाओं का जीवंत इतिहास बनाया है। उनकी कविताएँ आज भी हमें आध्यात्मिक ज्ञान देती हैं और उनके दोहों का संदेश आज भी मानवता के लिए उतना ही उपयोगी है जितना की वर्षो पहले था। 

आज के इस लेख में हम Kabir Das Ka Jivan Parichay, उनके दोहों का महत्व और उनके बारे में अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों पर चर्चा करेंगे। तो चलिए, जानते हैं कबीर दास जी के बारे में और उनके दोहों से जुड़ी अनोखी बातें।

कबीर दास जी का जीवन परिचय | Kabir Das Biography in Hindi

Kabir Das Ka Jivan Parichay को  हम दो हिस्सों में विभाजित कर समझेंगे :

#1 कबीर दास का जीवन परिचय

  • कबीर दास का जन्म 
  • कबीर की शैक्षिक योग्यता 
  • कबीर दास की मृत्यु 
  • कबीर दास की रचनाएँ एवं भाषा 

#2 कबीर दास जी से सम्बंधित कहानियां

कबीर दास का जन्म | Kabir Das Birth

Kabir Das ka Jivan Parichay समझने के लिए हम उनके जन्म से शुरुआत करते है, कबीर दास के जन्म के बारे में आज तक कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है यहां तक की उनके माता-पिता के नाम भी अनुपलब्ध हैं। 

हालांकि, ऐसा माना जाता है कि कबीर दास जी का जन्म विक्रम संवत 1455 ईसा पूर्व (सन 1398 लगभग) में बनारस में हुआ था। उनके माता-पिता का नाम निरु और नीमा था। कबीर जी का जन्म बनारस के लहरतारा तालाब के किनारे हुआ था और उनका पालन-पोषण उनकी माँ नीमा ने किया था। 

कबीर जी का परिवार जुलाहों का था और जो कपड़ों के बुनकर थे। कबीर जी एक कर्मयोगी थे और उन्होंने कर्म को अपना मूल मंत्र माना था। उन्होंने भगवान को सबका समान माना था और उन्होंने अपने दोहों के माध्यम से सभी को एकता और धर्मान्तर के बारे में समझाया।

कबीर दास जी का विवाह, पत्नी और पुत्र | Kabir Das Children

कबीर दास जी भक्ति के अद्भुत मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति थे और विवाह के बंधनों से मुक्त होना चाहते थे।  लेकिन वह समाज में फैले अंधविश्वास, जो कहते थे कि भक्ति के लिए घर परिवार को त्यागना पड़ता है और संयासी वेश धारण करना पड़ता है, उससे पूरी तरह सहमत नहीं थे।

इसलिए, इन बातों को साबित करने के लिए, वह अपने वचनों के खिलाफ गए और उन्होंने विवाह किया और अपनी बातों एवं सिद्धान्तों पर खरे भी उतरे।

कबीर दास की पत्नी का नाम लोई था और उनके दोनों संतान हुए थे। उनके पुत्र का नाम कमाल था और पुत्री का नाम कमाली था।

कबीर दास जी की शिक्षा | Kabir Das Education

कबीर दास जी ने किसी आश्रमं या किसी स्कूल से शिक्षा ग्रहण नहीं की थी, उन्होंने अपने जीवन में सबकुछ अपने अनुभव और स्वामी रामानंद जी से सीखा था, जिन्हे वह अपना गुरु मानते थे। गुरु और शिष्य के रहस्य को जानने के लिए आगे पढ़ते रहिये।

कबीर दास जी की मृत्यु | Kabir Das Death

कबीर दास के निधन से संबंधित एक रोचक तथ्य यह है कि उन्हें अंतिम क्षणों का पता चल गया था। वे काशी में रहते थे और इस शहर में ही उनका निवास स्थान था। लोग मानते हैं कि काशी में प्राण त्यागने वाले व्यक्ति को मुक्ति मिल जाती है, जो जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त हो जाता है।

जब कबीर जी को अपने आखिरी समय का पता चला तो वे काशी को छोड़कर मगहर गए। मगहर में प्राण त्यागने वाले व्यक्ति को नरक की भयानक यातनाएं भोगनी पड़ती हैं और वह मुक्ति से वंचित हो जाता है।

लेकिन कबीर दास जी ने अपनी भक्ति को मुक्ति का साधन माना था। उन्होंने कहा था कि भक्ति के द्वारा ही मनुष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। उनके अनुसार, सच्ची भक्ति से मनुष्य अपनी आत्मा को दुख से मुक्त कर सकता है।

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कबीर दास जी ने मगहर में जाकर अपने आखरी समय व्यतीत किया था। वह यह सच करने के लिए गए थे कि क्या वास्तव में मगहर में अंतिम संस्कार के बाद नरक का भय दिखाई देता है या फिर मुक्ति मिलती है।

जैसा कि ज्ञात है, जीवन के कर्मों के आधार पर स्वर्ग और नरक का फल मिलता है, चाहे वह काशी में मरने से हो या मगहर में।

कबीर जी का जन्म विक्रम संवत 1455 ईसा पूर्व (सन 1398 लगभग) में हुआ था और उनका देहावसान मगहर में हुआ था। इस स्थान से उनका शरीर गायब हो गया था और सम्पूर्ण दुनिया में यह बात मशहूर है कि उनके अंतिम संस्कार के बाद वहां केवल फूल रह गए थे। ये फूल हिंदू और मुस्लिम समाज ने अपने-अपने तरीके से आधे-आधे बांटे और ले गए थे।

कबीर दास की रचनाएँ एवं भाषा

कबीर दास एक महान संत, कवि और समाज सुधारक थे। उनकी रचनाएं भारतीय साहित्य की महत्त्वपूर्ण धरोहर हैं। कबीर जी ने अपने काव्यों में कई प्रकार की भाषाओं का उपयोग किया था। उनकी रचनाओं में ब्रज भाषा, अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली, पंजाबी, हरयाणवी आदि भाषाएं मिलती हैं।

कबीर जी की भाषा का अद्भुत संगम अनेक भाषाओं की मिलावट से हुआ था। उनकी भाषा को सधुक्कड़ी, खिचड़ी, पंचमेल आदि कहा जाता है। कबीर जी ने कभी लिखित रचनाएं नहीं की थीं, उनकी वाणियों के माध्यम से ही उनकी उपलब्धियों को संजोए जाते हैं। 

उनके परलोक जाने के बाद, उनके अनुयायी उनकी वाणियों को संग्रहित करके “बिजक” नामक ग्रंथ का संचय बनाया था। इस ग्रंथ में कबीर जी की रचनाएं एकत्रित हैं और यह ग्रंथ उनकी संदेशों और विचारों का एक महत्त्वपूर्ण संग्रह है।

 “बिजक” ग्रन्थ को मुख्य तीन भागो में विभाजित किया गया था, जो कि इस प्रकार है :

  • साखी 
  • सबद (पद)
  • रमैनी  

कबीर की सखियाँ – Kabir Das ki Sakhiyan

कबीर की साखियां अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन्हें सुनने या पढ़ने से हमें जीवन के असली तत्वों का अनुभव होता है। कबीर ने जीवन के विभिन्न पहलुओं को संक्षिप्त शब्दों में बयान किया था। ये साखियां संस्कृति के अंग्रेजी कहावतों की तरह हैं जो एक छोटी कहानी के जरिए हमें ज्ञान देते हैं।

कबीर की साखियों में अंतर्मुखी और बाहरमुखी दोनों प्रकार की शिक्षा होती है। अंतर्मुखी साखियां हमें अपने अंदर के तत्वों का अनुभव कराती हैं जबकि बाहरमुखी साखियां हमें बाहरी जीवन के तत्वों को समझाती हैं।

कबीर की साखियों में जीवन के हर पहलू को शामिल किया गया है। इनमें धर्म, आध्यात्मिकता, संघर्ष, समझौता, प्रेम और विवेक जैसे विषयों को संदर्भित किया गया है। कबीर की साखियों से हमें एक समान जीवन की सीख मिलती है, जो हर व्यक्ति अपने जीवन में उतार सकता है।

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साखी शब्द को संस्कृत भाषा से लिया गया है जिसका शब्दि अर्थ “साक्षी ” होता है। साखी का अधिकतर उपयोग धर्म के उपदेश देने के लिए किया गया है। साखी को अधिकतम दोहा छंद में लिखा गया है परन्तु कुछ जगह पर इसमें सोरठा का भी इस्तेमाल किया गया है।

सबद (पद)

सबद को गेय पद भी कहा जाता है। यह एक विशेष प्रकार का शब्द होता है, जिसमें संगीत का विशेष महत्त्व होता है। इसे एक लय में गाया जाता है और इसमें भावनाओं की भरमार होती है। कबीर की रचनाओं में सबद अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसमें उन्होंने अपनी भावनाओं को संगीत के माध्यम से प्रगट किया है। इसलिए सबद शब्द के उपयोग से कबीर ने लोगों को उनके अन्तर्मन के बारे में बताया है।

रमैनी | Kabir Das Ki Ramaini

रमैनी एक महत्वपूर्ण रचना है, जिसमें कबीर ने अपने विचारों को चौपाई छंद के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। इसमें कबीर द्वारा हिन्दू, मुस्लिम, सिख आदि सभी धर्मों को समान रूप से शिक्षा दी गई है। यह रचना उनकी विविधताओं को संगमित करती है और अन्त में सबके लिए एक ही उद्देश्य होता है।

रमैनी में 84 पद हैं जो कबीर द्वारा लिखे गए हैं। इन पदों में कबीर ने अपने रहस्यमयी एवं दार्शनिक विचारों को अभिव्यक्त किया है। इसमें बीजक की प्रस्तावना भी कही जाती है। रमैनी के माध्यम से कबीर ने सभी लोगों को धार्मिक शिक्षा देने का संदेश दिया है।

कबीर दास की ज्ञानवर्धक कहानियाँ | Kabir Das Stories in Hindi

कबीर दास जी के जीवन से जुड़े ऐसे बहुत से रहस्य है जिनके बारे बहुत कम लोग जानते है, इसलिए हम आपको उन्ही में से कुछ कहानियों और जीवन शैली को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे है।

कहानी #1 : कबीर दास की अपने मन पर विजय

एक दिन, कबीर दास जी बाजार में से गुजर रहे थे जब उन्हें एक जलेबी की दुकान नजर आई। वे बहुत मन से जलेबी खाने की इच्छा करने लगे। धीरे-धीरे वे दुकान के सामने खड़े हो गए और जलेबी खरीद ली। बाद में, वे एक वृक्ष के नीचे बैठ गए।

कबीर जी ने जलेबी को खाने से इनकार कर दिया और अपने मन से कहा कि वह जलेबी खाना नहीं चाहते। उन्होंने जलेबी खरीदी केवल अपनी इच्छा पूरी करने के लिए।

फिर भी, कबीर जी के मन में बार-बार जलेबी खाने की इच्छा उठती रही। उन्होंने अपने मन को समझाने का प्रयास किया और कहा कि वह अपने शरीर के बाहर निकल कर जलेबी खा सकते हैं।

ऐसा करते-करते, कबीर जी की जलेबी खाने की इच्छा समाप्त हो गई। उन्होंने जलेबियों को नहीं खाया और मन से लड़ाई जीत ली।

थोड़ी देर बाद एक कुत्ता दौड़ते हुए उनके पास आया और जलेबियों को चबाकर चला गया। कबीर जी को इस घटना से अपने मन को समझने का एहसास हुआ। उन्होंने अपनी मन की बेकाबू इच्छाओं पर काबू पाने का निर्णय लिया और उन्होंने जीत हासिल की।

इस कहानी सी क्या सीख मिलती है: कबीर जी ने अपनी इच्छाओं पर काबू पाकर मन पर विजय प्राप्त की। उन्होंने जलेबी खाने की इच्छा को दबाकर साबित कर दिया कि इंसान इच्छाशक्ति से मन को नियंत्रित कर सकता है।

कहानी #2 कबीर दास जी ने रामानंद को गुरु कैसे बनाया?

शुरुआत में कबीर जी ने रामानंद जी से कहा कि उन्हें अपना शिष्य बनाना चाहते हैं, लेकिन रामानंद जी ने इस सुझाव को नकार दिया। कबीर जी ने फिर ठान लिया कि रामानंद जी को ही अपना गुरु बनायेंगे। 

कबीर जी ने स्वामी रामानंद को अपना गुरु बनाने के लिए एक योजना बनाई। वे जानते थे कि सुबह 4 बजे स्नान करने के लिए रामानंद जी गंगा घाट पर जाते हैं।

इस जानकारी का उपयोग करते हुए, कबीर ने रात में घाट के सीढ़ियों पर लेट जाने का फैसला किया। जैसे ही रामानंद जी सीढ़ियों से उतरते थे, कबीर जी ने उनके पाँव पकड़ लिए।

जब गुरु रामानंद जी स्नान करने के लिए गंगा घाट पर आए तो रात में अंधेरे के कारण उन्होंने कबीर को नहीं देखा और उनकी लात से ठोकर मार दी। ठोकर मारने के बाद रामानंद जी ने कबीर से पूछा, “बेटा, क्या तुम्हें चोट लगी है?”।

इस पर कबीर जी ने रामानंद जी के पैर पकड़ लिए और उनसे अपना गुरु बनने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन रामानंद जी ने इसे नकार दिया और कहा कि वह केवल राजपरिवार के राजकुमारों को ही अपना शिष्य बना सकते हैं।

कुछ समय बाद, कबीर जी ने रामानंद जी से पूछा, “बताइए, किसका अधिकार होता है – पिता की संपत्ति या ज्ञान पर?” रामानंद जी ने उत्तर दिया कि पिता की संपत्ति पर उसके बेटे का अधिकार होता है।

कबीर दास जी ने कहा था कि उन्हें अभी-अभी उनके बेटे कहा गया था, इसलिए अब वह उनके पिता बन गए हैं। अब उन्हें उनकी संपत्ति और शिक्षा पर पूर्ण अधिकार है। इस प्रकार, कबीर ने अपना अधिकार दर्शाया।

रामानन्द जी कुछ नहीं कह पाए और अंत में वे कबीर जी को अपना शिष्य स्वीकार करना पड़ा। इस तरह, कबीर जी ने स्वामी रामानन्द को अपना गुरु बनाया और खुद उनके चेले बन गए।

इस कहानी सी क्या सीख मिलती है: यह कहानी हमें सिखाती है कि यदि हम अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहते हैं और कठिन परिश्रम करते हैं, तो हम सफलता प्राप्त कर सकते हैं, चाहे कितनी भी बाधाएं आएं।

कहानी #3 कबीर दास की एक सांस की कीमत

कबीर दास जी जीवन भर भगवान के सुमिरन में लगे रहते थे। उन्होंने हर पल भगवान के नाम का जप करते हुए अपनी आत्मा को शुद्ध किया। ध्यान भी उन्होंने केवल भगवान की ओर ही लगाया रखा था।

कबीर दास के माता-पिता जुलाहे थे, जो कपड़ों का काम करते थे। एक दिन कबीर जी कपड़ा सीधा कर रहे थे तभी सुई से धागा निकल गया। कबीर जी सुई में फिर से धागा पिरोने लगे लेकिन धागा नहीं लगा। इस प्रकार धागा पिरोते-पिरोते कबीर जी का ध्यान भगवान के सुमिरन से हट गया और सुई धागे में लग गया।

कबीर दास ने अगले क्षण ध्यान को फिर से सुमिरन में केंद्रित कर दिया। वे जोर-जोर से बिलख-बिलख कर रोने लग गए। जब सभी ने कबीर दास को रोते हुए देखा तो सभी ने पूछना शुरू कर दिया कि तुम क्यों रो रहे हो?

कबीर दास जी ने जवाब दिया, “मेरी एक साँस व्यर्थ चली गई, क्योंकि मेरा ध्यान प्रभु से एक पल के लिए अलग हो गया था। इसलिए अगर मैं उस समय मर भी जाता तो मैं ईश्वर को क्या मुँह दिखाता? मेरा जीवन नष्ट हो जाता था और मेरी मुक्ति टल जाती। इसलिए मुझे बहुत दुःख हो रहा है कि मैंने एक सुई धागे के कारण अपना ध्यान प्रभु से हटा लिया। एक साँस भी कितनी कीमती होती है, लेकिन मैंने उसे ऐसे ही जाने दिया।”

इस प्रकार, कबीर ने साँसों के महत्व को समझाया और कहा कि इसकी कीमत कोई नहीं लगा सकता। इसी के सहारे, प्रभु का नाम शरीर में चलता है।

इसी घटना को ध्यान में रखते हुए कभी दाज जी ने एक साखी कही थी, ज इस प्रकार है : 

निरंजन माला ,घट में फिर है दिन – रात,

ऊपर आवे निचे जावे, साँस – साँस चढ़ जात ।

संसारी नर समझे नाहीं,बिरथा उमर गवात,

निरंजन माला घट में फिर है दिन – रात।   

इस कहानी सी क्या सीख मिलती है: कहानी में कबीर दास जी एक क्षण के लिए ध्यान भटकने पर पश्चाताप करते हैं। यह हमें सिखाता है कि समय कीमती है और इसका सदुपयोग करना चाहिए। क्षणभंगुर क्षणों को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।

कहानी #4 कबीर दास ने अपने गुरु को चेला बनाया। 

एक बार गुरु रामानंद ने कबीरदास को आदेश दिया कि वह नगर में एक महत्वपूर्ण कार्य के लिए जा रहे है और उससे पहले भगवान को कपड़ों में बांधकर गंगा नदी में स्नान करवा कर लाए।

कबीर ने उनकी आज्ञा का पालन किया और गुरु द्वारा दिए गए मूर्तियों को लेकर वह गंगा के तट पर चले गए। इस बीच, गुरु रामानंद नगर में चले गए।

बाद में, जब गुरु जी ने अपने कार्य को पूरा कर लिया तब उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा कि कबीर कहां है।

शिष्यों ने बताया कि कबीर गंगा के तट पर भगवान को स्नान करवाने के लिए ले गए है।

गुरु जी ने अपने शिष्यों से कहा, “कबीर दास, गंगा तट से नहीं आया है जाओ वहां जाकर उसे बुलाकर लाओ और कहना कि गुरु जी बुला रहे हैं।”

इस पर कबीर शिष्य गंगा तट पर गया और बोला, “तुम्हे गुरु जी बुला रहे हैं।”

कबीर ने उत्तर दिया, “अभी मैं भगवान को स्नान करवाने के बाद आता हूँ।”

फिर उसने अपने शिष्यों को बताया और गुरु रामानंद जी के पास जाकर उन्हें सब बताया।

रामानंद जी वहां गए और तुरंत कबीर को पूछा, “कबीर, तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

कबीरदास ने उत्तर दिया, “गंगा तट पर भगवान को स्नान करवा रहा है।”

इसके बाद गुरु जी ने पूछा, “भगवान कहाँ हैं?

कबीरदास ने उत्तर दिया, “गंगा में स्नान करने गए हैं और अभी तक वहां से नहीं आए हैं। मुझे लगता है कि वे नदी में ही डूब गए हैं।”

गुरुजी ने अपने शिष्य कबीरदास से पूछा – “कहाँ हैं भगवान?”। कबीरदास ने उत्तर दिया – “गुरुजी, भगवान गंगा में स्नान करने गए हैं, इसलिए अभी तक वे बाहर नहीं आए हैं। मुझे लगता है कि भगवान नदी में ही डूब गए हैं।”

रामानंद जी ने कबीरदास से कहा – “अरे कबीरा, तूने क्या कर दिया? भगवान को नदी में फेंक दिया।” कबीर जी ने उत्तर दिया – “गुरुदेव, जब ये पत्थर के भगवान स्वयं एक नदी से नहीं निकल पाए, तब आपको और मुझे भवसागर से कैसे पार लगाएंगे।”

इस बात पर कबीरदास और उनके गुरु रामानंद जी के बीच बहस उठ गई। गुरुजी ने कहा – “तुमने भगवान का अपमान किया है। भगवान तुम्हें दंड देंगे।” कबीरदास ने जवाब दिया – “गुरु जी, मैंने ईश्वर का अपमान नहीं किया है। मैं सिर्फ आपको समझाने की कोशिश कर रहा हूँ कि ये पत्थर की मूर्ति भगवान नहीं है।”

घट बिन कहूँ ना देखिये राम रहा भरपूर ,

जिन जाना तिन पास है दूर कहा उन दूर। 

आपके शरीर में भगवान का विराजमान होना चाहिए, इसलिए आपको अपने शरीर की पूजा करनी चाहिए और अपनी आत्मा में परमात्मा को खोजना चाहिए। 

रामानंद जी ने कबीर से यह सवाल किया कि शरीर में भगवान का प्रमाण कैसे देखा जा सकता है। कबीर जी ने रामानंद जी को उनके शरीर में भगवान के दिव्य प्रकाश को देखने के लिए कहा। रामानंद जी ने उस प्रकाश में मंत्रमुग्ध हो गए और फिर वे कबीर जी के चेले बन गए। 

फिर कबीर दास जी ने सत्य का प्रचार करने के लिए अपने गुरु को अपना चेला बनाया और उन्हें गुरु नाम की दीक्षा दी। इस तरह कबीर जी ने अपने गुरु को अपना चेला बनाया और सत्य के प्रमाण को स्पष्ट किया।

इस कहानी सी क्या सीख मिलती है: कबीरदास जी ने गुरु रामानंद जी को सिखाया कि पत्थर की मूर्तियां भगवान नहीं हैं, असली भगवान हमारे अंदर मौजूद हैं। हमें अपने शरीर की पूजा करनी चाहिए और अपनी आत्मा में परमात्मा को खोजना चाहिए।

हमें उम्मीद है कि आपको Kabir Das Ka Jivan Parichay और उनके जीवन से प्रेरित कहानियों को पढ़ कर सकारात्मक अनुभव प्राप्त हुआ होगा, लेकिन अगर इससे संबधित फिर भी कोई सवाल रहता है तो आप हमें कमेंट कर सकते है।

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